Tuesday, November 8, 2011

इतिहास आज दो विचारधारों के द्वंद्व में लहुलुहान हो रहा है


मैं चुप हूँ क्योंकि चुप रहना ही ठीक है. बात न सिर्फ रामानुजन की है नहीं राम कथा की. बात इतिहास की व्याख्या पर वर्चस्व की है. हम क्रन्तिकारी और तुम प्रतिक्रांतिकारी बनाम हम सच्चे भारतीय और तुम नकली भारतीय के उद्घोषकों के बीच चल रहे इस उठापटक में न तो कोई तीसरी आवाज़ है और न ही कोई उस आवाज़ का संज्ञान लेने वाला. सच तो यह है की इतिहास आज दो विचारधारों के द्वंद्व में लहुलुहान हो रहा है. तटस्थ होकर इति...हास की मीमांशा करने के दिन लड़ गए से लगते हैं. पर जो अपने सच से आँखें नहीं मिला सकता वह किसी भी चुनौती का सामना नहीं कर सकता, चाहे चुनौती भ्रष्टाचार की हो या नक्सली हिंसा की या फिर साम्प्रदायिकता की ही क्यों न हो? इतिहासकारों को इस तस्वीर में लिखी इबारत पढ़नी ही होगी. संस्कृति के सवाल को बहुत सनसनीखेज बनाकर दोनों खेमों के पहलवान सिर्फ संस्कृति हो ही आहत कर रहे हैं.

मैं व्यक्तिगत रूप से इसलिए भी दुखी हूँ क्योंकि दिल्लीविश्वविद्यालय में जब धर्म और संस्कृति के विषय इतिहास में निषिद्ध थे तब भी मैं उन चाँद लोगों में से था जो इस विषय पर खुलकर बात करने की सार्वजनिक वकालत करता था. इसकी अंतिम और सुखद परिणति तब हुयी प्रोफ़ेसर टी. के. वेंकट सुब्रमनियन इतिहास विभाग के अध्यक्ष थे और मैं इतिहास विभाग के शिक्षकों की जेनेरल बॉडी बैठक से निर्वाचित होकर सिलेबल रिविज़न कमिटी का सदस्य बना था. सिलेबस कमिटी की बैठक में मैं अकेला सदस्य था जिसने सबसे पहले तीन बिन्दुओं को उठाया--

1.दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के पाठ्यक्रम में धर्म तथा संस्कृति पर अलग और स्वतंत्र रूप से पेपर पढाया जाये.
2..आधुनिक भारतीय इतिहास को १९४७ से आगे बढाकर १९७७ तक लाया जाना चाहिए क्योंकि आपातकाल भारत की महत्वपूर्ण घटना है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.
3.सोसल फ़ोरमेसन का पेपर थर्ड ईयर से निकालकर फर्स्ट ईयर में लगाया जाये.
तीसरे मुद्दे को पहले भी कई जेनेरल बॉडी मीटिंग में मैं उठा चुका था, जहाँ मेरी बात अनसुनी कर दी गयी थी.
खैर अब जबकी मैं खुद ही इस समिति का सदस्य था, इतनी अस्सानी से मेरी बात अनसुनी नहीं की जा सकती थी, हालाँकि कुछ प्रारंभिक विरोध जरूर हुआ था. देशबंधु कालेज के शैलेन्द्र मोहन झा भी उस समिति के सदस्य थे, जिसमे यह पूरी बहस चली थी. अंततः बनकट साहब को भी मेरी बात सही लगी और तीनों मुद्दों पर सहमति बन गयी. यह अलग बात है की जब इन पर्चों के अन्दर विषय-वास्तु के निर्धारण हेतु उप-समिति गठित करने की बैठक हुयी तो मुझे इसकी सूचना नहीं मिली. मैं नहीं जनता हूँ की ऐसा जानबूझकर किया गया या ऐसा होना एक संयोग था, पर मैंने इसे मुद्दा नहीं बनाया क्योंकि मेरा असली उद्येश्य पूरा हो चुका था--मेरे द्वारा उठाये गए मुद्दे स्वीकृत हो चुके थे.

निर्धारित प्रक्रिया के तहत बी.ए. प्रोग्राम के प्रथम वर्ष में पहले मुद्दे को जगह दी गयी, आनर्स के सिलेबस में तृतीय वर्ष में दूसरे मुद्दे को जगह दी गयी और आनर्स के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में तीसरे मुद्दे को जगह दी गयी.

मुझे मालूम है की इस मंच पर ऐसे लोग भी लगातार गैर जरूरी और निजी विद्वेष से ग्रसित होकर लिखने वाले लोग भी हैं, अतः सबसे विनम्र निवेदन है की मेरी बातों का सत्यापन तत्कालीन अध्यक्ष वेंकट साहब से कर लें तभी किसी के द्वारा प्रितिकूल टिप्पणी और विष-वमन पर ध्यान दें क्योंकि ऐसे लोग सिर्फ सैडिस्ट होते हैं और किसी के रचनात्मक कार्य से इन्हें चिढ होती है क्योंकि इन्होने जीवनैसे ही नौकरी करते हुए गुजारी होती है.

खैर, फिर जब २००६ से बी.ए. आनर्स के द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए मौजूदा पर्चा आया तो मुझे बेहद हार्दिक प्रसन्नता हुयी क्योंकि मुझे विश्वास हो गया की अब भारत का इतिहास सिर्फ आर्थिक-सामजिक न रहकर धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टि से भी पढाया जायेगा, इस विश्वविद्यालय में भी. मैं तब से इस परचे को पढ़ा रहा हूँ. मुझे कहने में कोई आपत्ति नहीं है की इस परचे को पढ़ते समय अगर कही असहजता होती है तो नाट्यशास्त्र में वर्णित नायिका के गुणों और श्रृंगारिक भंगिमाओं के वर्णन में न की रामायण को पढ़ने में. इसीलिए जब २००८ में तत्कालीन अध्यक्ष जाफरी साहब के साथ कुछ लोगों ने दुर्व्यवहार किया था तो मैंने उसका जमकर विरोध किया था, विद्वत परिषद् के अन्दर और बाहर--दोनों जगहों पर.

जब तत्कालीन कुलपति पेंटल साहब का सर कलम कर देने का किसी ने फतवा जारी किया था तब भी मैंने ऐसा ही विरोध किया था और फरवरी २००८ में विश्वविद्यालय में एक तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन संस्कृति के सवाल पर कराया था. सनद रहे की इस सेमीनार में ही पहली बार इस विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए कुलपति साहब ने अपना वक्तव्य दिया था. किसी सज्जन की इच्छा हो तो इस सेमीनार की वीडियो मुझसे लेकर देखा सकता है. इस सेमिनार में वेंकट साहेब, भैरवी साहू जी, जाफरी साहेब, ठाकरान साहेब, जे.एन. यूं. से आनद कुमार, जामिया से रिजवान कैसर समेत अन्य कई चर्चित इतिहासकारों तथा समाज शास्त्रियों ने हिस्सा लिया था और इस उबलते सवाल के शांतिपूर्ण शमन का वातावरण बना था.

इस पूरे वृतांत का मेरा आशय यह है की मैं यह पहले बता दूं की इस प्रकरण से मैं किस हद तक जुदा हुआ हूँ--गोया मैं स्वयं इसका एक पात्र हूँ. इसीलिए अब तक मैं इस पर चुप रहा हूँ की कहाँ खो गया मेरा वह प्रयास जिसके तहत संस्कृति का सवाल इस विश्वविद्यालय में भी महत्वपूर्ण सवाल बना था. क्या इस पूरे शोरगुल में कही भी इसकी जायज चिंता किसी भी पक्ष द्वारा दिखाई जा रही है?

Sunday, August 28, 2011

पूरा देश अत्मविश्वास से लबरेज है---वो सुबह कभी तो आयेगी.

अब अण्णा का अनशन समाप्त हुआ. अण्णा के शब्दों मे स्थगित हुआ है, समाप्त नहीं. बहुत कुछ देखा-सुना-समझा, पूरे दौर में. रोज रामलीला मैदान गया. डूटा के चुनाव के दिन भी गया अपनी इसी समझ को बढाने हेतु. लिखा भी. लगतार लिखा, कुछ छपा, बहुत नहीं छपा. हां वेब साईट पर जरूर पोस्ट करता रहा. अनुभव की दुनिया जरूर स्मृद्ध हुयी. अगर हमें नया संसार बनाना है तो बहुत कुछ करना होगा. नये भारत के निर्माण के लिये अभी बहुत कुछ योगदान करना होगा. सवाधीनता अन्दोलन के इस चौथे दौर मे हमें कयी असहज सवाल भी पू्छने होंगे, अपने आप से भी और वेसे तमाम लोगों से, जो नया समाज बनाने की प्रक्रिया मे लगे हुए हैं--अरसे से. कयी नवीन मानदंड गढने होंगे, कयी पुरातन मूल्यों को भी अपनाना होगा. ताकत परम्परा से लेनी होगी, समझ नयी बनानी होगी. मौजूदा अन्दोलन की कमजोरियों से भी सबक लेना होगा और इसकी शक्ति से अपना खोया अत्मविश्वास हसिल करना होगा. पूरा देश अत्मविश्वास से लबरेज है---वो सुबह कभी तो आयेगी.

Sunday, August 21, 2011

अद्भुत शिक्षक को मेरा कोटिशः अंतिम प्रणाम.

प्रोफ़ेसर राम शरण शर्मा की मृत्य भारतीय इतिहास लेखन की ही नहीं बल्कि प्रगतिशील चिन्तन की अपूरणीय क्षति है. लगातार कई पीढ़ियों को इतिहास की उस अवधारण से, जो भारत में डी.डी.कोशाम्बी और इंगलैंड में ए.एल .बाशम विकसित कर  रहे थे, के मूल तत्वों से बनी थी वे पिछले आधे दशक से भी ज्यादा समय से परिचित करा रहे थे. आज ४-४ पीढ़ियों के लोग उनके विद्यार्थी बनाने का गौरव हासिल कर चुके है और उनकी अगाध विद्वता से सनी हुई अद्भुत शिक्षण शैली से से इतिहास की समझ बनाने में सफल हुए हैं.१९८४-१९८६ में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास , प्राचीन इतिहास में एम. ए. करने के दौर में मुझे भी उनका छात्र बनाने का गौरव मिला था. हालाँकि वे सेवा निवृत हो चुके थे परन्तु प्रोफ़ेसर डी.एन. झा के निवेदन पर तथा हमलोगों के अनुनय -विनय पर उन्होंने अपने आवास पर ही एक पेपर हमें पढाया था. हमारा बैच उनसे पढ़ने वाले विद्यार्थियों का आख़िरी बैच था. सचमुच हमने उनके जैसे महान विद्वान और उत्कृष्ट शिक्षक के विद्यार्थी के रूप में जीवन की अमूल्य निधि हासिल की है.
प्रोफ़ेसर राम शरण शर्मा के सच्चे शिष्य के रूप में प्रोफ़ेसर डी.एन.झा ने बिलकुल वही मेनारिज्म और पढ़ने का अंदाज़ पाया है जिनसे उनके छात्र उनमे प्रोफ़ेसर शर्मा का विस्तार देखते हैं.
एक और बात. मेरे कॉलेज, एस. पी. कॉलेज, दुमका के दिवंगत गुरुदेव, प्रोफ़ेसर देवेन्द्र कुवर, जो पटना विश्वविद्यालय में गुरुदेव प्रोफ़ेसर डी.एन.झा के सहपाठी और गुरुदेव प्रोफ़ेसर आर.एस.शर्मा के शिष्य थे भी हमें इनके बारे में बहुत बाते बताया करते थे. मेरे स्वर्गीय पूज्य पिताजी पंकज जी जो अपने समय में उस क्षेत्र के हिन्दी साहित्य के मर्मज्ञ और उद्भट विद्वान समझे जाते थे, ने अपनी औपचारिक अंगरेजी शिक्षा पद्धति देर से शुरू की थी. जब आर.एस.शर्मा टी.एन. बी. कॉलेज में शिक्षक थे तब मेरे पिताजी हिन्दी के सुविख्यात विद्वान् और हमउम्र होने के वावजूद शर्मा जी के आई.ए. के छात्र थे. दुर्भाग्य से मेरे पिताजी १९७७ में ही ५८ वर्ष की अल्पायु में ही दिवंगत हो गए. परन्तु यह बात संयोग नहीं है की मुझे विज्ञानं पी पढ़ाई से हटाकर इतिहास की पढ़ाई करने को विवश करते हुए पिताजी ने जो सोचा था उसी के तहत आज मैं इतिहास का विद्यार्थी हूँ. क्या शर्मा जी जैसे मित्र और शिक्षक से प्रभावित होकर उन्होंने ऐसा किया था? जो भी हो परन्तु यह तो सुखद संयोग और अभिमान की बात है की शर्मा जी मेरे दिवंगत पिताजी और मेरे --दोनों के शिक्षक थे.
इस सुविख्यात इतिहासकार, मौलिक चिन्तक, उद्भट विद्वान् और अद्भुत शिक्षक को मेरा कोटिशः अंतिम प्रणाम.