Friday, November 3, 2017

जिन्दगी जीने की तुम्हें ललक बढ़ गई है
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जिन्दगी जीने की तुम्हें ललक बढ़ गई है
फिर से आज पीने की चसक बढ़ गई है।
फैली हुई आग फिर भी हर तरफ अँधेरा
धुआँ में घर बनाने की सनक बढ़ गई है।
हाथों में हाथ डाल बैठते जो साथ-साथ
आँखें अब दिखाने लगे चमक बढ़ गई है।
नफरतों के घेरे में कैद हुई जिंदगी जबसे
खत्म हुई शर्मो-हया व ठसक बढ़ गई है।
छूकर आती रही उनको ये महकती हवा
बहारो रुक दिलों की कसक बढ़ गई है।
पीना ही पड़ेगा 'अमर' जहर भी जों लाएँ
तैरती हुई सांसों की भी महक बढ़ गई है ।
शेर कहने की जबसे आदत बन गई
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शेर कहने की जबसे आदत बन गई
वक्त की हर शै ही इबादत बन गई।
लमहा-लमहा जीने का सुरूर आ रहा
लमहा-लमहा मरना किस्मत बन गई।
पीता हूँ जब भी तो बढ़ जाती है प्यास
पीयेे बगैर जिंदगी ही मुसीबत बन गई।
तन्हा कोई पीता कोई पीता भरे-बज़्म
पीये बिन गुफ्तगू एक हसरत बन गई।
अपने-अपने हिस्से का पी रहे हैं सभी
कतरा-ए-ग़म पीने की फितरत बन गई।
पीने की ख़्वाहिश में बेचैन तुम 'अमर'
अश्कों को पी लेने की चाहत बन गई।
किधर से चली जिन्दगी किधर जा रही है
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किधर से चली जिन्दगी किधर जा रही है
ना मालूम कहाँ से ऐसी जिया आ रही है।
देखता हूँ सब कुछ पर कुछ दीखता नहीं
आफताब चढ़ रहा उधर घटा छा रही है।
कल कुछ भी नहीं था आज भी कुछ नहीं
किसको पता हवा भी सौगात ला रही है।
जिस्म मचलता रहा और जिगर जल गया
आग को आग अब किस कदर खा रही है।
रोने की सूरत में भी हँसने की आदत उसे
गम और खुशी के गीत बेफिक्र गा रही है।
समा क्या अजब 'अमर' कुछ सूझता नहीं
अंधेरे-उजाले की ये रंगत गजब ढा रही है।