Thursday, June 30, 2011

पंकज जी की ९२वी जयन्ती भी चुपचाप गुजर गयी


आज ३० जून था. १८५५ की ३० जून को संताल परगना में संताल क्रांति हुयी. उसके बाद से ही इस क्षेत्र का नाम संताल परगना पड़ा.
आज झारखण्ड में संताल हूल दिवस राजकीय दिवस के रूप में मनाया जाता है. महान सिदु - कान्हू को क्या पता था की वे इतिहास बनाने जा रहे हैं.

इसी तरह ३० जून १९१९ को पंकज जी का जन्म हुआ. पंकज जी ने बहुत कम उम्र पाई. लेकिन कम उम्र में ही उन्होंने ऐसे काम कर दिए जो आज चमत्कार लगते हैं. उन्होंने एक मानव द्वारा सम्भव हर दिशा में अपने व्यक्तित्व की छाप छोडी. शिक्षा, साहित्य, स्वाधीनता-संग्राम, रंगकर्म, मानवीय श्रम की गरिमा की स्थापना, उछातम जीवन मूल्यों की स्थापना, कविता, एकांकी, प्रहसन, समीक्षा, वक्तृत्व कला---प्रत्येक दिशा में पंकज जी अप्रतिम थे. विद्वता ऐसी की बड़े-बड़े नतमस्तक थे, शिक्षण ऐसा की छात्र दीवाने थे, संभाषण ऐसा की जन-समूह झूम उठाता था, काव्य-पथ ऐसा की श्रोता रोने लगते थे, सुबकने लगते थे तो वीर रश के साथ सबकी भुजाएं फड़कने लगती थीं. संताल परगना में पंकज-गोष्ठी के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य सृजन की जो अलख जगाये उअसने उन्हें इतिहास निर्माता बना दिया. शायद उन्हें भी नहीं पता होगा कि वे इतिहास रचाने जा रहे हैं.

सवभाव शिशु की तरह निर्मल. जो भी उनसे मिलता था उनका कायल हो जाता था. सुगठित कद्दावर काया, सुदर्शन व्यक्तित्व, अद्भुत आकर्षण था उनके भौतिक व्यक्तित्व में भी. झकझक सफ़ेद खाधी की धोती और कुर्ता उनके व्यक्तित्व को ऐसा बना देता था मनो उनको देखते ही रह जाओ.

पंकज जी जब ५७ वर्षा की अल्पायु में चल बसे तो संपूर्ण अंचल में मनो बज्रपात हो गया हो. 
आज भी, उनके चले जाने के ३४ वर्षों बाद भी वहां के लोग उनकी स्मृति को आपनी पावन धरोहर मानते हैं.

उनकी ९२वी जयन्ती पर तथा रवींद्र टेगोर की १५०वी जयन्ती पर दोघर में कार्यक्रम आयोजित करना था--पर नहीं कर पाया. देखता हूँ, उनकी ३४वी पुण्य-तिथि पर, १७ सितम्बर को यह कार्यक्रम कर पाटा हूँ की नहीं. इच्छा और योजना--दोनों है, अगर संसाधनों का प्रबंध हो जय तो इसे सहज संपन्न कर पाउँगा. पंकज जी ने संताल परगना के निवासियों को जिस ज्ञान का अवदान दिया उसे कृतज्ञता के साथ याद किया जाता रहेगा.

२९ जून को उनके शिष्य और संताल परगना की एक अन्य महँ विभूति प्रोफ़ेसर सत्यधन मिश्र जी का भी जन्म दिन है. इस साल वे ७५ साल पुरे कर गए. मेरा इरादा था की पंकज जयन्ती और सत्यधन बाबू की हीरक जयन्ती एक साथ मनाऊँ. सत्यधन बाबु ने संताल आदिवाशियों में चेतना जागृत करने में जो भूमिका निभाई है वह अद्वितीय है-- कोई भी संताल या गैर संताल व्यक्ति इस दिशा में सत्यधन बाबू की बराबरी नहीं कर सकता है. सत्यधन बाबू ने मेरा व्यक्तित्व गढ़ने में भी भूमिका निभाई है. सत्यधन बाबू के योगदानों को रेखांकित किये बगैर संताल परगना का इतिहास अधूरा रहेगा. सचमुच वे पंकज जी जैसे योग्य गुरु के योग्य शिष्य थे. हम सबको मिलकर सत्यधन बाबू को उनका वाजिब सम्मान देना चाहिए, उनके योगदानों को रेखांकित करना चाहिए. लगता है की संताल परगना और वहां के सपूतों को इतिहास में वाजिब स्थान दिलाने की जिम्मेवारी मेरी ही है-- तभी तो आज तक किसी ने कुछ भी नाहे लिखा इन विषयों पर. 

पंकज जी और सत्यधन बाबू ही नहीं, संपूर्ण संताल परगना और वहां की प्रतिभावों की कातर पुकार मेरे कानों में निरंतर कोलाहित हो रही है. पता नहीं कब मै यह पुनीत कर्त्तव्य पूरा कर पाउँगा--अभी तो बस अपने नून-तेल के ही फेर में लगा हुआ हूँ. 

पता नहीं कब मैं अपनी यह जिम्मेदारी पुरी करूंगा.

सहज मानवीय भावनाओं के कुशल चितेरे कवि ज्योतींद्र प्रसाद झा ’पंकज’


डॉ. विश्वनाथ झा

उपनिदेशक - राजभाषा विभाग, बेंगलूर 


          अभी-अभी 30 जून गुजरा. 30 जून हूल क्रांति दिवस है. यह इतिहास का वो दिन है जब संतालपरगना के आदिवासियों ने सन 1855 में भोगनाडीह गांव में सिदो, कान्हू, चांद और भैरव - इन चार भाइयों के नेतृत्व में महाजनों, सूदखोरों और प्रकारांतर से ब्रिटिश महाप्रभुओं के विरूद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद किया और ब्रिटिशसत्ता को धत्ता बताते हुए पूरे के पूरे दामिन क्षेत्र में स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. शायद भारत का यह पहला स्वतंत्रता संघर्ष था.
          इसी 30 जून [वर्ष 2009] को एक और घटना घटी. दुमका में सूचना भवन में कवि आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा ’पंकज’ की 90वीं जयंती मनाई गई. 30 जून 1919 को, तब के बिहार और अब के झारखंड के संतालपरगना के सारठ थाना के खैरबनी नामक गुमनाम से गांव में इस कवि ने जन्म लिया था. जयंती में तत्कालीन संताल परगना जिले की और अब के दुमका, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज और पाकुड़ के साहित्यिक जगत की नामचीन हस्तियां जुटी थीं. इस लेख का लेखक भी संयोग से इस उत्सव में शरीक था. जयंती उत्सव बड़े शानदार ढंग से पूर्ण सफलता से साथ मनाया गया.
          पूरे उत्सव के दौरान एक प्रश्न निरंतर अपनी पूरी उठान से साथ सामने आता रहा कि मृत्यु के 32 वर्षों बाद [16 सितंबर 1977 को कवि पंकज का असामयिक निधन हुआ था] जी हां 1 नहीं 2 नहीं 10 नहीं 20 नहीं पूरे 32 वर्षों के बाद कवि पंकज की स्मृति में आयोजित उनकी 90वीं जयंती में भाग लेने जिले के मूर्धन्यतम व्यक्तित्व उपस्थित हुए हों तो निश्यय ही कोई बात उस व्यक्तित्व में रही होगी. पंकज जी के प्रति जनमानस के आकर्षण की इसी पड़ताल ने लेखक को पंकज जी के उस कवि रूप तक पहुंचा दिया जो पूरी सहजता से मानवीय-जन की भावनाओं के व्यावहारिक चित्र आंक देता है. शायद यही पंकज की सबसे बड़ी सामाजिक और साहित्यक देन है कि हर कोई उनकी कविताओं से अपने आपको जुड़ा हुआ महसूस करता है. मानव मन की इन्हीं सहज भावनाओं के चित्रण के लिये उन्होंने अपने आपको किसी ’वाद’ से नहीं जुड़ने दिया. अपनी काव्य पुस्तक ’उद्‍गार’ के प्राक्कथन में कवि की स्वीकारोक्ति भी है - "वर्तमान युग विभिन्न मतवादों का युग बन गया है परंतु मैंने शक्ति भर इस गोरखधंधे से अपने आप को बचाने का प्रयास किया है. फिर भी अतिशय वाद प्रेमी किसी न किसी प्रकार का वाद इसमें भी ढूंढ ही ले सकते हैं". अस्तु , कवि की इस आत्मस्वीकारोक्ति और उनके काव्य के गहन अवगाहन से एक सत्य प्रकट होता है और वह सत्य है "सबार ऊपरे मानुष सत्त". कवि ने सही अर्थों में मानव जीवन जिया, जी हां, मानव जीवन जो इंसान का जीवन है, वह इंसानी जीवन, जो भगवान और शैतान के बीच का है. वह जीवन जिसने यदि ’मलयानिल’ का सुखद संस्पर्श पाया है तो जीवन के ’झांझावातों’से भी अक्सर दो-चार हुआ है. इसीलिए पंकज की स्नेहदीप और उद्‍गार में संकलित कविताएं [दुर्भाग्य से कवि द्वारा रचित असंख्य कविताओं में से सिर्फ कुछ कविताएं ही प्रकाशन का मुंह देख पायीं] ही उनकी स्मृतिशेष हैं. ये कविताएं उनके जीवन की अनुपम अनुभव गाथाएं ही हैं. कबीर के शब्दों में कहें तो ये - "हौं कहता आंखिन की देखी" हैं. इसे ही घनानंद ने कितनी मार्मिकता के साथ इन शब्दों में उकेरा है - "लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोही तो तेरे कवित्त बनावत". आइए कवि श्री ज्योतींद्र प्रसाद झा ’पंकज’ की कविताओं में सहज मानवीय भावनाओं का रसास्वादन करें-
          जब सहज मानवीयता की बात की जा रही है तो इसका अर्थ कवि की भावनाओं की सहजता और उसकी अकृत्रिम अभिव्यक्ति से है. एक आम आदमी की तरह ही कवि ने जीवन के ’अमृत’और ’गरल’दोनों का पान किया है. वस्तुत: उन्हें जीवन ने गरल पान का अवसर ही अधिक दिया किंतु गरल की पीड़ा को विषपायी शंकर की तरह अपने में समेट कर नीलकंठ कैसे बना जा सकता है, कवि ने यह दुनिया को दिखा दिया है. यद्यपि इन दोनों संकलनों में संग्रहित कविताओं में सृजन की तिथि नहीं दी गई है; जिसके कारण कवि की भावनाओं और विचारों के विकास को ऐतिहासिक क्रम में समझ पाने का अवकाश नहीं मिल पाता है किंतु यदि भावनाओं ओ आधार मानकर, रूमानियत और परिवक्वता को आधार मानकर, कविताओं का अध्ययन किया जाए तो यह साफ पता चलता है कि उनकी कविताओं में मिले-जुले स्वर हैं. जीवन के कैशौर्य काल की रूमानियत रह-रहकर कविताओं में अपना सिर उठाती है, किसी अजाने अचिह्ने की ओर रह रहकर इंगित करती है -


कौन स्वप्न के चंद्रलोक से छाया बन उतरी भू पर
सुभग कल्पना की प्रतिमा सी नवल इन्द्र धनु की सुंदर
नयनों में मादक पराग ले इंगित में ले सृष्टि अमर
अधरों में अनुराग उषा ले स्निग्ध चांदनी स्मित में भर
कौन कौन यह विश्व मोहिनी माया वन की तितली कौन
भ्रू विलास के संकेतों में जो लुभा रही सबको मौन
                                                                                                                             -कौन


          रहस्य की यह कुहेलिका जब धीरे-धीरे स्पष्टप्रकाश की ओर आगे बढ़कर, भोर के उजाले में बदलती है तो कवि कली से आह्वान करता है


वामा ढली रजनी चली, खिल जा अरी बन की कली
ऊषा अरूण का राग ले नव किसलयों का साज ले
है धिरकती सत्वर बढ़ा पग नाचती बन बावली
खिल जा अरी बन की कली
                                                                                                                   -कली से

[पाठक कृप्या इस अन्तरे की तुलना जयशंकर प्रसाद की कविता बिती विभावरी जाग री से करें]

          रूमानियत का दौर खत्म होते ही कवि को जीवन की कटु सच्चाइयों का पता चलता है तो कवि का मूड भी बदल जाता है. पूरी संजीदगी से जीवन के ’कालकूट’ का पान करने को वह पूरे दम खम से आगे बढ़ता है. उसे अपने पर, अपनी क्षमता पर पूर्ण विश्वास है. कवि का यह विश्वास मानव की अटूट - अदम्य आत्मिक शक्ति पर विश्वास भी है. जरा इन पंक्तियों पर गौर कीजिए, कितनी उत्साहवर्धक हैं ये पंक्तियां -


मत कहो कि तुम दुर्बल हो
मत कहो कि तुम निर्बल हो
तुम में अजेय पौरूष है
तुम काल-जयी अभिमानी।

या फिर

तुम शास्वतस्त्रोत अक्षय हो
तुम अप्रमेय तुम चिन्मय
विज्ञान-ज्ञान की निधि तुम
तुम हो असीम तुम भास्वर।


दो फेंक आवरण वह जो तुमको है लघु बतलाता
द्विविधा का जाल बिछाकर है बीच डगर भरमाता

                                                                                                                       -आश्वासन


          कवि की ये उत्साहपूर्ण उक्तियां उकठे काठ में भी प्राण फूंक पाने में सक्षम हैं. ये पंक्तियां निश्चय ही मानव मन की निराशा को दूर भगाकर उसमें सहज ही नई चेतना जगा पाने में सक्षम हैं.
कवि को अपने पौरूष पर प्रगाढ़ विश्वास है. उसे पता है कि यह पौरूष केवल उसमें नहीं, प्रकृति के जाए हर उस इंसान में है जो हाड़ मांस से बना है. किंतु केवल हाड़ मांस का पुतला होने के कारण ही वह कतई कमजोर, असहाय या निर्बल नहीं है. देखें कवि को मानवीय क्षमता पर विश्वास कितना बढ़-चढ़कर है

मुझमें है भीषण ज्वाल भरा मैं महासिंधु का गर्जन हूं ।
हिल उठे धारा डोले अंबर वह प्रलयंकारी आवर्तन हूं ॥


मैं हिमगिरि का उन्नत मस्तक जो झुकता नहीं कभी पलभर
अभिमान चूर्ण कर त्रिदेशों का जो छू सकता उंचा अंबर

          कवि को यह पता है कि जीवन की यह डगर आसान नहीं. इसमें पग-पग पर कांटे बिछे हैं, किंतु कांटों की परवाह करने वाला भी कभी क्या जीवन में कुछ पा सका है. मंजिल उसे ही मिलती है जो इन शूलों को फूलों में बदल पाने की क्षमता रखता हो,

फूलों पर पग धरने में क्या वह तो अतिशय सुकर सरल
शूलों पर चलना दुष्कर है व्रती अचंचल वहां सफल
                                                                                                                             - उद्‍गार

          स्वाभाविक ही है कि शूल भरे रास्तों पर चलने वाला थकेगा. उन थके हारे मुसाफिरों के लिए कितनी उत्साहवर्धन करने वाली हैं कवि पंकज की ये पंक्तियां -

मंजिल झांक रही वह देखो हारे चरणों को बढ़ने दो
लक्ष्य आद्रि के तुंग श्रृंग पर विजयकेतु बनकर चढने दो
रुको न क्षण भर राही डर है, शायद कहीं लौट तुम आओ
मोह खींच ले दुर्बल पग को विरत साधना से हो जाओ
                                                                                                       -मंजिल

          संघर्ष, संघर्ष और संघर्ष, कवि पंकज की असाधारण जिजीविषा ही है जो इस संघर्ष चेतना को ’अयं निज: परो वेति’ से ऊपर उठाते हुए ’वसुधैव कुटुंबकम्’ की और ले जाती है. उसे अपने चारो ओर दीन-हीन, दबे-कुचले और वंचित जन समूह का परावार दिखाई पड़ता है. तब गांधीवादी आदर्शों से ओत-प्रोत कवि का मन सहज ही पुकार उठता है

दलित मनुजता को अपनाओ - बंधु आज यह युग पुकार हो
रहे न कोई आज उपेक्षित, रहे न कोई आज बुभुक्षित
नहीं तिरस्कृत लांछित कोई, आज प्रगति का मुक्त द्वार हो
                                                                                                   - युग की पुकार

          कवि जैसे-जैसे जीवन और दर्शन में आगे बढ़ता जाता है, समाज की तल्ख सच्चाइयों से भी उसका वास्ता पड़ता जाता है. उसे सामने ही दीख पड़ता है चोट खाया हुआ इंसान, उसे सुनाई पड़ती है घायल मानवता की कराह. किंतु कवि को अफसोस इस बात का है कि दुनिया इससे क्यों नहीं पिघलती. इतनी संगदिल क्यों हो गई है दुनिया, क्यों वह ऐसा व्यवहार कर रही है मानो कुछ हुआ ही न हो -

बहुत है दर्द होता हृदय में साथी
कि जब नित देखता हूं सामने
कौड़ियों के मोल पर सम्मान बिकता है
कौड़ियों के मोल इंसान बिकता है
किंतु कितनी बेखबर हो गई दुनियां
कि इस पर आज भी परदा किए जाती।
                                                                                                            -बहुत है दर्द होता हृदय में साथी

कवि को जब यह पहेली समझ में नहीं आती तो बरबस ही कह उठता है:-

यह नहीं समझा था कि जग में फूल भी क्यों शूल बनता ?
कुसुम का कोमल हृदय क्यों झुलस कर है धूल बनता ?
अमृत के वर विटप तल क्यों जहर का है कीट पलता ?
पूर्णिमा के चांद से भी तीव्र हालाहल निकलता ?
                                                                                                           - पहेली

          यह कसक, यह हूक जब सीमा से आगे बढ जाती है तब कवि को यह भी लगने लगता है कि शायद ’पागल’ ही दुनिया में सबसे निश्चिंत है

जगत की चिंता से निर्मुक्त सतत तुम स्वीय भाव में लीन
धरा अंबर के गुप्त रहस्य खोलने में बस ममता हीन
खोजते क्या क्षण-क्षण पल-पल, अमर फल को तुम हे पागल।
                                                                                                            -पागल

किंतु कवि जल्द ही इस श्मशानी वैराग्य से ऊपर उठकर जयघोष करता है:

भले प्रतारित हूं मैं जग से मन न पराजित होने दूंगा
भले उपेक्षित हूं जन-जन से मन न उपेक्षित होने दूंगा
क्योंकि,

मैं झंझा में पलने वाला हूं, मेरा तो इतिहास अजब है
                                                                                                             -भले प्रतारित हूं मैं जग से

कवि को यह मालूम है कि

शिशिर की आह में जो जल नहीं सकता, भला मधुमास क्या जाने ।
अमां की राह में जो बल नहीं सकता किरण का हास क्या जाने

अंतत: कवि स्थित-प्रज्ञता की भाव भूमि पर पहुंचकर निर्विकार रूप में घोषित करता है

मैं समदरशी देता जग को
कर्मों का अमृत औ विष-फल

जीवन के प्रति निरंतर संघर्ष के बीच-बीच में रेगिस्तान के बीच मरूद्यान की शीतलता की तरह ही बीच-बीच में पंकज की कविताओं में प्रकृति के बड़े अनुपम चित्र भी मिलते हैं

एक बार इठलाती रात ने चाँद से पूछा-
गोरे मुखमंडल पर काला सा छाया है ?
बोला चाँद हंसकर । सच ही नहीं जानती हो क्या ?
तुम्हारे ही अंजन का दाग मन भाया है ।

          कवि पंकज अपने आस-पास की घटनाओं से भी अछूते नहीं हैं. जिन कुछ महापुरूषों ने कवि को गहरे तक प्रभावित किया है उनके प्रति भी कवि ने अपने उद्‍गार प्रकट किए हैं. इन महान विभूतियों से संबंधित कविताओं में ’तुलसी सा कवि,’ ’बापू,’ ’रवींद्र के प्रति’ ’शहीदों के प्रति’ आदि दर्शनीय है.
          कवि कभी छात्रों से संबोधित होता है तो कभी कवि से भी मुखतिब होता है. व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी भी कवि की रचनाओं में सहज ही झलक उठी है. युवावस्था में प्रथम पत्नी के देहांत की पीर को न संभाल पाने पर ’मानसी के प्रति’ ’मित्र की याद’ और ’बेबसी’ जैसी कविताएं मिलती हैं तो पुर्नविवाह के बाद जीवन को नए सिरे से जीते हुए और नए जीवन से सामंजस्य बिठाते हुए ’ग्रामीणा’जैसी कविताएं मिलती हैं.
सचमुच में कवि पंकज के अपने व्यक्तिगत जीवन के उद्‍गार ही उनकी कविताओं में हर जगह प्रकट हुए हैं. तभी तो कवि के गुरू, स्वनामधन्य महापंडित आचार्य जनार्दन मिश्र ’परमेश’ ने उद्‍गार संग्रह की भूमिका में आर्शीवचन के रूप में कवि पंकज के काव्य की सराहना "कवै: चित्तोद्‍गार: कव्य‍म्" के रूप में की है.
30 जून की इस पावन तिथि पर हमें संताल परगना के इस महामना कवि को याद करते हुए सच में गौरव का अनुभव हो रहा है. क्या आपको भी नहीं हो रहा ?



Tuesday, June 28, 2011

भ्रष्टाचार के विरोध के विरोध का सच


अन्ना हजारे और रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए अभियान के तहत हजारों लोगों के गोलबंद होने से भारतीय बौद्धिक जगत भी एक तरह के अजाने भय का शिकार हुआ सा दिखता है. सरकार की तरफ से जिस तरह से इस मुद्दे को लेकर असमंजस और विरोधाभास से परिपूर्ण रवैया अपनाया गया, उसे तो हम समझ सकते हैं, क्योंकि कोई भी सत्ता प्रतिष्ठान जनतांत्रिक आंदोलन से ’गोलबंद हुई भीड़’  की अनदेखी नहीं कर सकता है और न ही उनके लिये इस ’गोलबंद भीड़’ द्वारा उठाये गये सवालों से टकराना आसान होता है. इसी लिये भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों की तपिस ज्यों-ज्यों बढ़ती गयी, अनेक भ्रष्ट राजनीतिक ताकतों ने, जो हजारों-लाखों करोड़ रूपये के घोटालों के बावजूद राजनीति में अपनी महन्थी चला रहे हैं, इन आंदोलनों पर हमला शुरू कर दिया. वैसे देखा जाए तो राजनीतिक गुंडों द्वारा आंदोलनकारियों पर हमला कोई नई बात नहीं है - अजित सरकार, सफदर हाशमी, चंद्रशेखर, नियोगी, सुरेश चरण मिश्र - यह फेहरिस्त इतनी लंबी हो सकती है कि इस पर एक मुकम्मल लेख बन सकता है, जैसे बहादुर शहीद बनते रहे हैं. नयी बात यह है कि अब प्रदर्शनकारियों और सत्याग्रहियों पर रात की अंधियारी में पुलिसिया मर्दानगी दिखाई जा रही है. अन्ना के आंदोलन से भी उसी तरह से निपटने की धमकी दी जा रही है, जैसे रामदेव के आन्दोलन से निपटा गया. मुझे  ’नागरिक समाज’ के घोषित सदस्यों (वैसे हम सभी नागरिक समाज के ही सदस्य हैं) की निजता की न तो अधिक जानकारी है, और न ही जानकारी रखने की जरूरत है और मेरे जैसे लोगों को यही तथ्य प्रभावित करने हेतु काफी है कि कथित नागरिक समाज ने सर्वग्रासी भ्रष्टाचार से लड़ने का अभियान छेड़ा है.
जिस दिन अन्ना ने अपना अनशन शुरू किया उसी दिन औरों की तरह मैं भी वहां पहुंचा था. वहां जे एन यू  ब्रांड के लड़के-लड़कियों और अंग्रेजियत में डूबे मध्यमवर्गीय संभ्रांत औरतों-मर्दों का जमावड़ा भी था. उनकी जोशीली हरकतें ऐसी लग रही थी जो किसी पारंपरिक गांधीवादी आंदोलन में अकल्पनीय थी. मजेदार बात यह थी कि वे सभी गांधी की ही दुहाई दे रहे थे - गांधी को ही अपना आदर्श और विकल्प मान रहे थे. तो क्या यह जरूरी है कि गांधी का नाम लेने का हक उन्हें नहीं दिया जाए? अगर ओबामा गांधी का नाम लेते है तो क्या हम उनकी पोशाक को देखकर हम उन्हें खारिज कर देंगे? अगर मिस्र की भीड़ गांधीवादी तरीके को अपनाती है तो क्या हम उस भीड़ की ताकत को भी खारिज कर देंगे? फ्रांसीसी क्रांति, जिसे लोकतांत्रिक चेतना की जननी माना जाता है, क्या एक भीड़ की ताकत का ही प्रदर्शन नहीं था? वैसे अन्ना हजारे पोशाक से भी गांधीवादी ही नजर आते है, यह बात दीगर है. अन्ना हजारे तो एक सामान्य व्यक्ति हैं, फिर क्यों उनके पीछे इतनी बड़ी संख्या में तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई? क्या यह मध्यमवर्गीय रोमांटिसिज्म मात्र था? अन्ना तो अंग्रेजी बोल भी नहीं पाते हैं - एक सिपाही की तरह मन की भावनाओं को बेलाग बोल देते है, सुसंस्कृत भाषा की चासनी में लपेटे बिना. 
   यहीं यह भी कहना जरूरी है कि रामदेव ने क्या किया और क्या पाया - यह सबके सामने है. अगर रामदेव चालाकी न करते तो संभवत: वे इस लड़ाई को बहूत दूर तक ले जा सकते थे. अगर उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठान के हाथों खेलने की नादानी न की होती तो शायद आंदोलन अब तक बड़ा रूप ले चुका होता. दरअसल रामदेव की दुविधा एक ’राज्यवादी’ की दुविधा ही थी क्योंकि कौन नहीं जानता कि रामदेव अपने योग को भुनाने के लिए कभी उन्हीं भ्रष्ट नेताओं का सहारा लेते हुए उन्हें आशिर्वाद देने उनकें दरबार में हाजिरी लगाते थे जो आज उन्हें ’पेट फुलाने वाला बाबा’ और ’कुदनी बाबा’ कहकर अपमानित कर रहे हैं. लेकिन क्या यह ’महाज्ञान’ सिर्फ मुझे ही है या वे लोग भी इसे भलीभांति जानते हैं जो उनके योग के दिवाने हैं? इसका सीधा-सादा उत्तर है कि रामदेव भले ही डिसक्रेडिट हो गये हों लेकिन योग अभी भी अपनी क्रेडिबिलिटि बनाये हुए है. रामदेव ने दूसरी भूल यह की कि योग चिकित्सा के लाभुकों को अपनी राजनीति का भी अनुगामी मान लिया. योग-शिविरों में अपने प्रवचनों में ’बहुराष्ट्रीय कंपनी बनाम स्वदेशी’ तथा काले धन की वापसी के मुद्दे को जिस धारदार तरीके से वे उठा रहे थे, उसके प्रति उनके योग-शिविर के अंदर बैठे और दूर टीवी पर सुनने वाले बहुत से प्रसंशक रामदेव को एक आंदोलनकारी भी समझने लगे थे - तभी रामदेव का गुब्बारा फट गया. रामदेव की नेतृत्व क्षमता की कमी एक्सपोज हो गयी और वे एक भीरू की तरह रात के अंधेरे में सलवार-कुर्ता पहन कर भाग निकले. वे कहते हैं कि पुलिस उन्हें मारना चाहती थी- तो क्यों उन्होंने सच्चे आंदोलनकारी की तरह अपने अनुयायियों को बचाने के लिए गोली खाने की हिम्मत नहीं दिखाई? वास्तव में राज्य इस ’राज्यवादी’ रामदेव की नेतृत्व क्षमता की सीमाओं का आकलन पहले ही कर चुका था, इसलिये उनके विरोधाभाषों को सार्वजनिक करके बड़ी चतुराई से पहले तो उन्हें डिस्क्रेडिट किया, बाद में उनके आंदोलन पर बर्बर हमला बोला. परंतु इस बर्बर हमले का नतीजा क्या रहा? समाज के सभी तबके ने इसे लोकतंत्र पर बर्बर कुठाराघात करार दिया. इससे यह भी साबित हो गया कि तमाम विश्वसनीयता के संकट के बावजूद रामदेव का आंदोलन लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत ही कर रहा था, फिर अन्ना हजारे ने तो रामदेव की गलतियों से भी सबक जरूर ली होगी और अपने आंदोलन के लिये जरूरी होमवर्क भी किया होगा.
दरअसल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मौजूदा दौर की समझ को लेकर बुद्धिजीवियों में दिख रहा संकट उनकी ’राज्य-व्यवस्था’ की समझ से उपजा हुआ संकट है. सभी लोग इस बात पर तो एकमत हैं कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गड़बड़ जरूर है - पर कहां है और इसे कैसे ठीक किया जाए इसको लेकर सब अपनी ढपली अपना राग बजा रहे हैं. ’मेरा कुर्ता तुम्हारे कुर्ते से ज्यादा साफ’ की होड़ भी इसी की उपज है. लेकिन यह होड़ अब गला-काटू विरोध तक पहूंच चुका है और मसीजीवी अब एक-दूसरे के खून के प्यासे से दिखते हैं. जी हां, खून बहाने वाली विचारधारा का हिमायती भी खून का प्यासा ही कहा जाएगा. इधर आमलोग भूल-भुलैया में है कि किसे असली समझे? हरा, नीला, लाल, सफेद, गेरूआ- सब तो बस रंग ही है, अपने रंग की सीमाओं में कैद. वादों के गोरख-धंधेबाज दिखते है सब. गांधी, लोहिया, जय प्रकाश, अंबेडकर, मार्क्स, नेहरू, दीनदयाल उपाध्याय तथा माओ का मंत्र जपेंगे ये - ऐसा ही ये करते आए हैं अब तक, पर समस्या सुरसा के मुँह की तरह बढती ही जा रही है. तो क्या ’हनुमान’ का रूपक उत्तर बनकर आ सकता है जो ’सुरसा’ की तरह ही अपना आकार-प्रकार बढ़ाता है और मौका मिलते ही ’लघु’ रूप धारण कर अपने उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में बढ़ जाता है. क्या अन्ना के आंदोलन में शामिल लोगों में ऐसे लोग भी नहीं थे जो रोजमर्रा के जीवन में छोटे-मोटे भ्रष्टाचार का साथ देते हैं, परंतु मौका मिलते ही उनसे भिड़ने वालों के साथ हो लेते हैं? ऐसा इसलिये है क्यों कि भ्रष्टाचार की चक्की में सभी पिस रहे होते है.
मेरे कॉलेज के एक मित्र ने बड़ा मासूम सा सवाल किया था कि क्या हम सब कहीं न कहीं, किसी न किसी स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देते हैं? क्या हममें से कोई सौ-फीसदी ईमानदार है? उनकी बात को यों ही सनकी दिमाग की उपज कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है. परंतु इससे यह कतई साबित नहीं होता है कि वे भ्रष्टाचारियों की पाँत में खड़ा होना चाहते हैं. दर‍असल यह उनकी मानसिक पीड़ा है जो पेशेवर रूप में बेहद ईमानदार होते हुए भी रोजमर्रा की जिन्दगी में उन्हें भ्रष्टाचार से समझौता करने को बाध्य करती है. यही आम लोगों की भी पीड़ा है. इसीलिये अन्ना आम लोगों के बीच भ्रष्टाचार विरोध के प्रतीक बन गये और हम सभी अन्ना के सहयात्री बनते चले गये, उनसे मिलकर या मिले बगैर ही.
हमारे लेखक मित्रों ने एक बुनियादी सवाल खड़ा करना चाहा है कि कौन सा खतरा वास्तविक है - भ्रष्टाचार का खतरा या सांप्रदायिकता का खतरा? क्या यह सवाल ठीक वैसा ही नहीं है जैसा कि यह कहना कि कौन ज्यादा खतरनाक है - नागनाथ या सांपनाथ? मुझे लगता है कि यह सवाल उस साम्यवादी मोहग्रस्त बौद्धिकता की उपज है, जिससे देश पिछले साठ-सत्तर सालों से घिरा हुआ है. क्या साम्यवादी चश्में से देखकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है? क्या सांप्रदायिकता भी एक तरह का भ्रष्टाचार नहीं है? क्या भ्रष्टाचारियों का भी नया ’राजनीतिक-नौकरशाह-ठेकेदार’ का नया मजबूत सम्प्रदाय नहीं बनता जा रहा है जिसका मंत्र लूट-खसोट और हथियार हत्या और दमन है? सत्ता के लिये भोली-भाली जनता को सांप्रदायिक खानों में बांटकर उनका दोहन करना और सत्ता के लिये ही भ्रष्टाचार को राजनीति का अनिवार्य सत्य बना देना- क्य ये दोनों मौजूदा बुनियादी सवाल नहीं हैं जिसपर हम सब को मिलकर सोचना चाहिये? 
यह सच है कि राजनीति करने वाले तमाम लोग भ्रष्ट नहीं हैं तथा भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति करने वाले लोग थोड़े ही सही, लेकिन आज भी हैं. परंतु राजनीति का दूसरा सच यह भी है कि ऐसे शुद्धतावादी ’राजनीतिक भ्रष्टाचार’ के विरोध में अभी तक कोई बड़ा आंदोलन, देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने में सक्षम नहीं हुए हैं. इसके विपरित तमाम राजनीतिक दलों में, कुछ अपवादों को छोड़कर, ऊपर से नीचे तक सभी कोई आकंठ भ्रष्टाचार की दलदल में धंसे हुए हैं और राजनीति करने की इच्छा रखने वाले उत्साही ईमानदार कर्यकर्ता को भी इस दलदल में घसीट लेते हैं. अत: भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मौजूदा दौर को एक सुअवसर समझकर शुद्धतावादी राजनीति के तमाम लोगों को भ्रष्टाचार के विरोध में कूद जाना चाहिये. मैं सभी दोस्तों से निवेदन करना चाहूंगा कि संघर्ष चाहे ’मां-मानुष-माटी’ के नाम पर हो या ’जल-जंगल-जमीन’ के नाम पर हो; सामाजिक न्याय के नाम पर हो या वर्ग-संघर्ष के नाम पर हो; या फिर भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर ही क्यों न हो, सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के लिये चल रहे किसी भी आंदोलन का हमें भागीदार बनना चाहिये. भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे इस मजबूत आंदोलन के सहभागी बनकर हम सभी इसमें धीरे-धीरे उन तमाम सवालों को जोड़कर इसका फलक बहुआयामी बना सकते हैं और इसे दूसरा स्वाधीनता आंदोलन भी बना सकते हैं. लेकिन इसकी एक ही शर्त है कि हमें अपने-अपने वादों के गोरखधंधे से बाहर निकलना होगा, अन्यथा जिस तरह वादों के गोरखधंधों ने हिन्दी साहित्य के पटल पर कालिख पोत दी है, भारत के इतिहास की एकांगी व्याख्या को ही वैज्ञानिक इतिहास लेखन बना दिया है, ठीक उसी तरह सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को भी यह वादों के गोरख धंधों की जागीर बना देगा- इसमें कोई संदेह नहीं.

अमरनाथ झा
एसोसिएट प्रोफेसर
स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय
फोन - +919871603621
ब्लॉग - http://www.amarpankajjha.blogspot.com